स्वस्थ्य रहने के लिए औषधियों के परावलंबन से बचना होगा

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मानवीय काया प्रकृति की सर्वोत्तम रचना है । इतना समर्थ और अध्बुत यन्त्र संसार में दूसरा कोई नहीं होगा । अगर आहार विहार के नियमों  का ठीक तरह से पालन भर किया जाये तो शरीर को स्वस्थ्य रखा जा सकता है । विजातीय तत्वो के शरीर से निष्कासन और परिशोधन के लिए शरीर में जीवन शक्ति का सुचारू तरीके से चलना वेहद आवश्यक है  ऐसे समय में हडवाडकर तेज दवाओं के शरण में जाने की अपेक्षा थोड़ा धैर्य रखा जाये, खान – पान मई थोड़ा संयम वरता  जाये और प्रकृति को अपना काम ठीक प्रकार से करने दिया जाये तो रोग से छुटकारा मिल सकते है ।

प्रकृति संसार की सर्वोत्तम चिक्तिसक है, इस सत्य को अगर ठीक ढंग से जानना हो तो प्रकृति के समीप रहने वाले जीवजंतुओं को देखकर किया जा सकता है वे यदाकदा ही बीमार पड़ते है । वे खाना पीना छोड़कर अपने शरीर को प्रकृति को समर्प्रित क्र देते है और प्रकृति को अपना काम करने देते है और जल्दी ही ठीक हो जाते है ।

कृतिम जीवनक्रम का एक और अभिशाप जुड़ा हुआ है – आरोग्य प्राप्ति के लिए दवाओं की गुलामी स्वीकार कर लेना । एलोपैथी अपनी वाल्यावस्था मैं तीज प्रभावो के कारन लोकप्रिय हुई थी। बीमारियों के लिए उसे रामवन समझ गया और सर्वत अपनाया गया । परन्तु अब यह अनुभव किया जा रहा है की तात्कालिक प्रभावो के लिए अलोपथी जितनी ही लाभकारी सिद्ध होती है, दूरगामी प्रभावो के लिए यह उतनी ही विशाक्त और हानिकारक है । ये एलोपैथी दवाएं कीटाणुओ को ही नहीं साथ ही शरीर की कोशिकाओं को भी मरती है और शरीर की जीवनी शक्ति को कमजोर बनाती है ।

एरिक डब्लू मार्टिन ने अपनी पुस्तक ‘ हेजार्डस ऑंफ मेडिकेशन ‘ मई लिखा है की आमतौर पर सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता की जिन दवाओं का वह सेवन कर रहा है वे इतनी खतरनाक भी हो सकती है ।

श्री ए० एच० रौंलेन ने अपनी पुस्तक ‘ इन्फ़्लुएंस ऑंफ यूरिनरी पी० एच० ऑन एक्सक्रीशन ऑंफ एककीटा मिन ‘ मैं एक आकड़ा प्रस्तुत किया है की सयुंक्त राज्य अमेरिका मैं प्रतिवर्ष अस्पतालों में १५ लाख से ३० लाख के संख्या मैं ऐसे मरीज दाखिल होते है जो ए० डी० आर० (एडवर्स ड्रग  रीएक्शन ) के घातक परुनामो से ग्रसित हैं । वे भयंकर यातनाओं से ग्रसित और पीड़ित थे ।

निःसन्दह चिकित्सा विज्ञानं के विकास ने मानव जाती की विशेष सेवा की है कितनी ही असाध्य बिमारियों के उपचार ढूंढ निकाल लिए गए है और कितनी के लिए चिक्तिसकगण भगीरथ श्रम  कर रहे है, इसके लिए उनकी जितनी भी प्रंशसा की जाये वह काम है परन्तु संकट तब उत्तपन्न होता है जब दबाव के उपयोग में अदूरदशिर्ता का परिचय दिया जाता है और हर छोटी मोती बीमारी में अंधाधुंध एलोपैथी दबाओं  का सेवन किया जाता है ।

विशिष्ठ पारिसिथितियों को छोड़कर अधिक अच्छा है की प्रकृति को शारीरिक परिशोधन एवम स्वस्थ्य – संतुलन के लिए स्वतः अवसर दिया जाएँ ।  दबाओं की गुलामी स्वीकार करने की तुलना में आहार – विहार के नियमों के पालन को अधिक महत्व दिया जाये । यह एक सुनिशिचत तथ्य है की प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा  करने से ही शरीर असुंतलन पैदा होता है और रोगों को आक्रमण करने का मौका मिलता है ॥

Ref::जीवेम शारद: शतम  १. १  – पंडित श्री राम शर्मा आचार्य 

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