कीटाणु नहीं, विजातीय द्रव्य

0
283

रोग की उत्तपत्ति के सम्बन्ध में प्राकृतिक चिकित्सा में जो कारण बताया गया है उसका प्रबल विरोध एलोपैथी चिकित्सा का कीटाणु सिद्धान्त करता है , इन लोगो का मानना है प्रायः सभी रोगों का कारण छोटे और हमारी आँखों से अद्रश्य कीटाणु है जो जल में, वायु में सभी खाद्ध पदार्थों में पाए जाते है और सदैव मुख, नासिका, और चार्म आदि के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते है जब इन कीटाणुओं की संख्या शरीर में ज्यादा हो जाती गई तो वे हमें दबा लेते है और जिस रोग से संबधित होते हे उसी रोग को उत्त्पन्न कर देते है ।

वास्तविक बात यह है की रोगों के कीटाणु होते अवश्य है , पर वे कहीं बहार से हमारें शरीर में प्रवेश नहीं करते है ओरण जब मॉल के विकार से हमारे शरीर में गन्दगी बढ़ती है तो उसी के साथ ये कीटाणु भी पैदा हो जाते है । डॉ० फ्रेजर ने बार बार परीक्षा करके यह सिद्ध किया है की रोग की उत्त्पति के बाद हे ये कीटाणु हमारे शरीर में पैदा होते है ।

प्राकृतिक चिकित्सा ने तो यह भी कहा है – कि जिस व्यक्ति के शरीर में विजातीय द्रव्य जमा न होंगे उसका ये कीटाणु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते है । जर्मनी के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो० पैटन कॉफर ने सैकङो विद्यार्थियों के सामने शीशी में रखे हुए हैजे के कीटाणुओ को पी लिया था लेकिन उन्हें कुछ नहीं हुआ क्योकि वे पहले ही बता चुके थे की मेरे शरीर में कोई गन्दगी नहीं हैं ।

मल ही समस्त रोगों का कारण होता है इसलिए जिन व्यक्तियों के शरीर में आहार – विहार की गलतियों के कारन पहले से मॉल जमा होता है और उसके कारण जिनका रक्त दूसित पद जाता है उन पर रोगों के कीटाणु प्रभाव डालते है ।

हम फिर बता देना चाहते है की हमारा उद्देश्य कीटाणुओं के अस्तित्व से इनकार करना नहीं है ये कीटाणु प्रकृति के एक बड़े साधन के रूप में है, जिनके द्वारा हम प्रकृति के एक बड़े साधन के रूप में है जिसके द्वारा वह  निर्माण और विनाश दोनों कार्यो को संपन्न करती है ।

वास्तव में हमारे रोगों का कारण हमारा आहार है हम जैसा आहार लगे वैसा ही हमारा शरीर बनेगा और वैसे ही आसपास के वातावरण का उसपर प्रभाव पड़ेगा।

आजकल लोगों ने आहार संबंधी नियमों का परित्याग कर दिया है और केवल जिह्वा के स्वाद के लिए और आहार तत्व को न समझ पाने के कारन जरुरत से ज्यादा और गलत समय पर और गलत खाध  पदार्थो का सेवन करते है जो की हमारी शारीरिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते और शरीर में जाकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्त्पन्न करते है ।

जीवेम शारद: शतम  १. १  – पंडित श्री राम शर्मा आचार्य

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY